छात्रों में प्रासंगिक जीवन कौशल और उचित मानसिक गुण विकसित करना क्यों आवश्यक है? इसके तीन कारण हैं।
1. आँकड़े बता रहे हैं नए कौशल सीखने की अत्यावश्यकता
- राष्ट्रीय सर्वेक्षणों के अनुसार, भारत में अल्प-सुविधाप्राप्त और अधिकांश ग्रामीण बच्चों में आयु-उपयुक्त साक्षरता और संख्यात्मक कौशल का अभाव है।
- सरकारी आँकड़ों के अनुसार, भारत में 5% से कम कामकाजी आबादी को औपचारिक कौशल प्रशिक्षण मिला है।
- लगभग 10–30% युवा (10–24 साल की उम्र) स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाले व्यवहार से ग्रस्त हैं, जैसे पोषण संबंधी विकार, तंबाकू और हानिकारक शराब का उपयोग, जोखिम वाले यौन व्यवहार, तनाव और सामान्य मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ।
- भारत के लगभग 12 करोड़ युवा एक जनसांख्यिकीय लाभांश बनें, इसके लिए ज़रूरी है कि वे सही ज्ञान, कौशल और मानसिक गुण विकसित कर आर्थिक रूप से स्वतंत्र बनें और राष्ट्र निर्माण में योगदान दें।
2. विघटनकारी प्रौद्योगिकियाँ और नौकरियों का ध्रुवीकरण
मशीन लर्निंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के कारण कंप्यूटर अब जटिल संज्ञानात्मक कार्य (complex cognitive tasks) करने के काबिल होते जा रहे हैं, जो अब तक हमें लगता था केवल हम मनुष्य ही कर सकते हैं। इस कारण रोज़गार और उद्यमिता का स्वरूप बदल रहा है।
अर्थशास्त्रियों के अनुसार, वैश्विक अर्थव्यवस्था रेत-घड़ी का आकार ले रही है। उच्च-कौशल अधिक-वेतन वाली नौकरियाँ और निम्न-कौशल कम-वेतन वाली नौकरियाँ तो आने वाले दशकों में रहेंगी, लेकिन मध्य-स्तरीय नियम-आधारित नौकरियाँ लुप्त हो जाएँगी, क्योंकि ऐसे काम AI-कंप्यूटर हम मनुष्यों की तुलना में अधिक कुशलता से कर सकेंगे। रेत-घड़ी के आकार की वैश्विक अर्थव्यवस्था नौकरियों के ध्रुवीकरण को दर्शाती है।
आज युवा यदि ऐसे सही कौशल नहीं सीखते जो उन्हें उच्च-कौशल अधिक-वेतन वाली नौकरियों या उद्यमिता की ओर ले जाएँ, तो लाज़मी है कि वे निम्न-कौशल कम-वेतन रोज़गार की ओर जाएँगे, क्योंकि मध्य-स्तरीय काम मिलना तो कम ही होता जाएगा। जॉब-स्पेक्ट्रम के निचले छोर पर बढ़ती आपूर्ति और स्थिर माँग आय को और कम करेगी और बेरोज़गारी बढ़ाएगी।
3. निर्धारित पाठ्यक्रम की कमियाँ
कल्पना कीजिए कि शिक्षा के DNA की संरचना डबल-हीलिक्स जैसी है। शिक्षा के DNA का पहला सूत्र है औपचारिक शिक्षा, जो विषय-ज्ञान और डिग्री हासिल करने के लिए महत्वपूर्ण है। लेकिन परीक्षा और अधिक अंक लाने की अंधी दौड़ के कारण आज औपचारिक शिक्षा विषय-ज्ञान को रटकर इम्तिहान में उगलने पर ध्यान देती है।
छात्रों को अक्सर अपने विषय की मौलिक अवधारणाओं की गहरी समझ नहीं होती, जबकि असल ज़िन्दगी में गहरी समझ ही सफलता का कारण बनती है। इसीलिए आज डिग्री होने के बावजूद छात्रों को अच्छी नौकरी नहीं मिलती, क्योंकि उनकी उथली समझ ज़िन्दगी की किसी जटिल समस्या का नया समाधान ढूँढने में सक्षम नहीं होती।
शिक्षा के DNA का दूसरा सूत्र है कालातीत जीवनकौशल: सीखने की ललक, सीखना सीखना और जीने की कला।